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भारत में औषधि (Pharmaceutical) क्षेत्र में जेनेरिक दवाओं (Generic Drugs) की हिस्सेदारी 70 प्रतिशत है।

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जेनेरिक दवाओं (Generic Medicines) को अधिक आकर्षक और पहचान योग्य बनाने के लिए केंद्र सरकार नई विपणन रणनीति लागू करने की तैयारी कर रही है, ताकि उपभोक्ताओं के बीच इसकी पहचान और भरोसा बढ़ाया जा सके।

केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय की नई योजना के अनुसार, जेनेरिक दवाओं को रंगों के माध्यम से अलग पहचान दी जाएगी, ताकि महंगी ब्रांडेड दवाओं (Branded Medicines) से उन्हें आसानी से अलग किया जा सके। इसका उद्देश्य उपभोक्ताओं को यह समझने में मदद करना है कि वे दवा खरीदते समय ब्रांडेड या जेनेरिक में से किसे चुनें। साथ ही, जेनेरिक दवाओं पर विशेष चिन्ह लगाने का प्रस्ताव भी रखा गया है।

भारत लंबे समय से विकासशील देशों की फार्मेसी (Pharmacy) के रूप में जाना जाता है और बड़ी मात्रा में जेनेरिक दवाओं का निर्यात करता रहा है। हालांकि हाल के वर्षों में बढ़ती प्रतिस्पर्धा और कड़े नियमों के कारण इस पहचान को बनाए रखना चुनौतीपूर्ण माना जा रहा है।

इसके बावजूद, भारत के औषधि क्षेत्र में जेनेरिक दवाओं की हिस्सेदारी सबसे अधिक है। वर्ष 2017 में कुल आय का लगभग 70 प्रतिशत हिस्सा जेनेरिक दवाओं से आया। यह केवल निर्यात तक सीमित नहीं है, बल्कि देश के भीतर भी जेनेरिक दवाओं के उपयोग को बढ़ावा देने की दिशा में प्रयास किए जा रहे हैं।

हाल के वर्षों में डॉक्टरों को यह निर्देश देने का प्रस्ताव रखा गया कि यदि किसी ब्रांडेड दवा (Branded Drug) के स्थान पर जेनेरिक विकल्प उपलब्ध हो, तो डॉक्टर दवा के नमक (Salt Name) का नाम लिखें, ताकि मरीज सस्ती जेनेरिक दवा चुन सकें। इस प्रस्ताव पर दवा कंपनियों, केमिस्ट और डॉक्टरों के बीच अलग-अलग प्रतिक्रियाएं देखने को मिलीं।

सरकारी स्तर पर ऐसी फार्मेसी खोली गई हैं जो केवल जेनेरिक दवाएं उपलब्ध कराती हैं। यह कदम राज्य और केंद्र दोनों स्तर पर स्वास्थ्य योजनाओं के तहत उठाया गया है। विशेष रूप से आयुष्मान भारत (Ayushman Bharat) और प्रधानमंत्री भारतीय जन औषधि परियोजना (PMBJP) के अंतर्गत जन औषधि केंद्र (Jan Aushadhi Kendra) स्थापित किए गए हैं, जहां किफायती जेनेरिक दवाएं उपलब्ध कराई जाती हैं। देशभर में ऐसे हजारों केंद्र संचालित हो रहे हैं।

जेनेरिक दवाओं को अधिक सुलभ और लोकप्रिय बनाने का प्रयास स्वास्थ्य खर्च को कम करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है। हालांकि अंतरराष्ट्रीय बाजार में प्रतिस्पर्धा और नियमों की चुनौतियां बनी हुई हैं, फिर भी भारत का जेनेरिक उद्योग आज भी एक मजबूत और प्रभावशाली स्थान रखता है।

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